
“जो आता है वही जाता है ।“
गुरु का महाप्रयाण
“ देह के जाने पर भी सदगुरु का अस्तित्व रहता है । मैं सदा ही हूँ । “
यूँ तो गुरु के साथ हर पल महत्वपूर्ण है किंतु यह सप्ताह कुछ विशेष है । आज का दिन गुरु की महासमाधि का
दिन है और आने वाली 30 तारीख़ को उनका जन्मदिवस है ।
अंतर्यामी , अनंत के प्रकाशक , ऊर्जा के दिव्य स्रोत गुरु का महा प्रयाण हुआ आज के दिन । जाने से पहले
योगिराज ने अनेक भक्तों को दर्शन दिए और सजग किया ।
उन्होंने कहा – “ ऋषियों द्वारा सेवित एवं साधित इस योगसाधना से जो संतृप्त होता है वह कभी भी निराश्रित
नहीं होता । यह प्राण कर्म कभी भी लुप्त नहीं हो सकता । यह चिरकाल से रहा है और रहेगा । “
२६ सितंबर, संध्या की वेला थी । दिन और रात के अद्भुत मिलन के साथ परम कृपालु गुरु की दिव्य आत्मा अपने
ही परम रूप में विलीन हो गयी । पद्मासन लगा हुआ था , मुख पर सैकड़ों सूर्यों की स्वर्णिम लालिमा थी ,
आलोकिक ऊर्जा बरस रही थी तथा सर्वत्र कस्तूरी महक उठी थी । पाँच बजकर पच्चीस मिनट पर , महाअष्टमी
को महा समाधि की स्थिति में युगपुरूष ने महापरायण किया । शंख ध्वनि बज उठी । भक्तों ने पुष्प मालाओं से
नश्वर देह का श्रिंगार किया । सैकड़ों हज़ारों की भीड़ ने जय घोष किया और ईश्वर के पूर्ण अवतार उस गृहस्थ
सन्यासी की नश्वर देह चितागनी में समाहित हो गयी ।
आँखो में अश्रु धार, हृदय में अपार प्रेम और मस्तक पर साधना धारण किए अनेक शिष्यों के मनो में गुरु के
अंतिम शब्द गूँज रहे थे ।
“ इस महान व अमर योग को जिसे गुरु देव के निकट प्राप्त करके पुनः स्थापित किया है भविष्य में लोग उसकी
घर घर में चर्चा करेंगे और धीरे धीरे मनुष्य मुक्तिपथ की ओर अग्रसर होगा । “
अधखुली आँखो से समाधिस्थ गुरु ने यह वचन जाने से पहले अपने कातर शिष्यों से कहे थे । पंडित पंचानन
भट्टाचार्य , प्रणवानंद , वंदयोपाध्यय आदि अनेक शिष्य गुरु के ही द्वारा दी गयी , उनके महाप्रयाण की पूर्व
सूचना पाकर एकत्र हुए थे । वे हतप्रभ से , अपने प्राणो से प्यारे गुरु को जाते हुए देख रहे थे । उस पूर्ण पुरुष
योगेश्वर गुरु के चले जाने से संसार रिक्त हो गया प्रतीत होता था । ऐसे गुरु को वे कैसे भूल सकते थे जिसने
केवल शिष्यों की सेवा भावना को संतुष्ट करने के लिए रोग का सहारा लिया था ।
अपने पुत्र तीनकौड़ी से योगिराज ने कहा था , “ मेरी कोई चिकित्सा करना अच्छा नहीं ।” किंतु फिर भी स्वस्थ
होते हुए भी उन्होंने शिष्यों के प्रेमवश सेवा स्वीकार की ।
“मृत्यु क्या है ?”
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए योगिराज ने एक बार कहा था -“ प्राकृतिक कारणों से चंचल मन का स्थिर हो जाना ही
नृत्यु है । … वास्तविक मृत्यु है ब्रह्म में लीन हो जाना । मूल उत्स या केंद्र तक पहुँचाना , जहाँ जाने पर पुनरावर्तन
नहीं होता अर्थात् पुनर्जन्म नहीं होता । “
उस अमर गुरु का चिर अभिनंदन
जय गुरुदेव
गुरु का जन्मदिन
उनकी जन्मतिथि थी 30 सितंबर 1828 और जन्म हुआ था धूरनी गाँव में श्री ग़ौरमोहन लाहरि की दूसरी पत्नी
श्रीमती मुक्तकेशि देवी के गर्भ से । किंतु क्या यही पूरा सच है गुरु योगिराज के जन्म का?
मेरे लिए गुरु का जन्म हुआ उस दिन, जिस दिन मेरा जन्म हुआ । मेरे साथ , मेरी आत्मा के साथ , आविर्भाव हुआ
उसे रास्ता दिखाने वाले का । ठीक वैसे ही जैसे भगवान कृष्ण कहते हैं “ सृष्टि (जीव) के साथ मैंने यज्ञ की रचना
की ।” माया के बंधन दिए ईश्वर ने जीव को और साथ ही बंधन मुक्ति का रास्ता दिखाया ‘यज्ञ ‘ रूप में । मेरी
जीवात्मा को भी पाँच भूतों में बांधा गुरु ने और साथ स्वयं आए अध्यात्म दर्शन द्वारा मुक्त कराने ।
यहाँ अब एक बार फिर से दोहरा लें कि गुरु क्या है? कूटस्थ स्टिथ आत्म ज्ञान का वाहक ही गुरु है । मुझ में तुम में
समान रूप से प्रत्येक काल और स्थान में समाहित । आत्मा का दर्पण, सत्य का सारथी , कूटस्थ बैठा साक्षी ही
समय आने पर गुरु रूप में मार्ग दर्शन करता है । यही समय उत्तम समय कहलाता है। यही समय गुरु का जन्म
दिवस है ।
यदि ऐसा है तब गुरु रूप से पृथ्वी पर मानव अवतार में ज्ञान देने वाला वह व्यक्ति कौन है? यदि गुरु कूटस्थ
स्टिथ हमारी ही ज्ञानमयी आत्मा है तब गद्दी पर बैठ कर सत्य का मार्ग दिखाने का दम भरने वाला मनुष्य क्या
गुरु नहीं?
देखिए , यहाँ बात हो रही है अद्वैत की। एकोहम द्वितियो नास्ति । तब जो बाहर बैठ कर ज्ञान दे रहा है और जो
अंदर बैठ कर ग्रहण कर रहा है उसमें कोई अंतर नहीं है।
हाँ, लोक व्यवहार तो कृष्ण और राम को भी निभाना पड़ा था , तब मायिक दृष्टि रखने वाले जीव उससे अलग कैसे
हो सकते हैं? इस प्रकार यह सिद्ध होता है की सत्य का ज्ञाता , आध्यात्मिक ज्ञान देने वाला पथप्रदर्शक – पिता के
समान आदरणीय,माता के समान प्रिय और सखा के समान हृदयस्थ होता है किंतु वास्तविक रूप मैं वह हमारी ही
आत्मा का वृहद अंश है।
तब गुरु का नाम क्या और उसका जन्म क्या ? कोई भी भाषा उस गुरु का विवरण करने में समर्थ नहीं जो ऊर्जा
स्वरूप हैं । ऐसे गुरु को एक ॐकार के अतिरिक्त कोई भी शब्द नाम नहीं दे सकता । व्यर्थ है व्याख्या की कोशिश
क्योंकि गुरु तो ब्रह्म हैं। पूर्ण पुरुष । पुरुषोत्तम।
दो अर्थों के बीच बहता हैं आध्यात्म । एक लोक व्यवहार , जिसे आप जानते हैं । दूसरा है आत्मिक दृष्टिकोण
जिसे जानना है। तब कैसा हो व्यवहार , विचार ? यह आता है चिंतन से , गुरु के शिक्षा प्रद वचनो को सुनने और
मनन करने से । क्या चाहते हैं गुरु ? क्या अच्छा लगता है उन्हें ? यह जानने की कोशिश ही सच्ची निष्ठा है गुरु के
प्रति ।
गुरु का असली जन्म तो हर पल है , और या फिर उस पल है जिस पल आपने उनका सत्य जाना । कूटस्थ पर
पहचाना । तो मनाइए उत्सव हर पल । पहचानिए गुरु के सत्य रूप को कूटस्थ पर । कीजिए साधन , भक्ति भाव
से नाम लीजिए ईश्वर का , मंत्र जप करिए और करिए सेवा प्राणी मात्र की । इसके अतिरिक्त क्या और किस रूप
से मनायेंगे जन्म दिवस गुरु का ?
यह गुरु शिष्य का सम्बंध मानवी नश्वर सम्बन्धों से कहीं ऊपर है। इसे केक काटने या गुरु को भेंट देने जैसे तुच्छ
लोकिक व्यवहार से मत प्रकट करिए । सावधान , कहीं सामने की गयी बरामबार की प्रशंशा गुरु को आपसे दूर न
कर दे ! सम्भव है कि आपके भावों से पिघलते हुए गुरु आपको रोक न पाएँ किंतु इससे किसी का भला नहीं होगा ।
न आपको परमात्मा मिलेंगे और न ही गुरु को सच्चा शिष्य । क्योंकि गुरु का आनंद तो केवल और केवल शिष्य
की आध्यात्मिक सफलता है उसका प्रेमलाप नहीं । हृदय के भावों को थाली में परोस कर , ढाँक कर , भोग स्वरूप
दीजिए गुरु को । उसे इतना खुला मत करिए की मिठास उड़ जाए ।
गुरु के लोकिक अवतरण को मनाना है तो उनकी बतायी ज्ञान , भक्ति , योग व समर्पण की भावनाओं पर विचार
करें । ऐसे भजन गाएँ की आँखें रोएँ और हृदय मुस्कुराए । ऐसी साधना करें कि सम्पूर्ण जगत कस्तूरी महक उठे।
ऐसा प्राणायाम करें कि वायु अपनी गति भूल जाए । ऐसा ध्यान धरें की ईश्वर ही आकर उठाएँ आसन से । ऐसी
जीव सेवा करें कि कोई मनुष्य भूखा न सोए , कोई प्राणी दर्द से न रोए और धरनी प्रसन्न हो आशीर्वाद दे उठे ।
सर्वे भवंतु सुखिन:…
— अपर्णा ��



